ग्रामीण आँचल में आज भी नाच गाकर धूमधाम से मनाई जाती है तीज,
मीठी तो करदे री-माँ कोथली, जाणा से बाहण के देश, पपीहा बोल्या बाग म्है। …. 2
हरियाणा के त्योहारो में अहम भूमिका निभाने वाला तीज का त्योहार आज भी बडी खुशी से झूल कर मनाया जाता है। सावन माह शुरू होने के साथ ही युवा हाथों में मोटे रस्से लिए पेडों पर चढ जाते है और बडे प्यार से अपनी बहनों, भाभीयों व परिवार वालों के लिए झूले बनाते है। इसी के साथ नव यौवनाएं व नव विवाहिताए सखियों के साथ झूले झूलते हुए इन गीतों को गुनगुनाती है। युवतीयों को रस्से के सहारे पींग पर ज्यादा से जयादा उपर चढाया जाता है और जब पींग टहनियों के पास पहुंच जाती है तो गीत गाती हुई युवतियॉ टहनियों से पत्ते तोडकर लाती है जिसे सासू का नाक कहा जाता है। खुशी से हसॅती, झूमती और झूलती इन युवतियों का यह दृश्य किसी को भी हरियाणवी संस्कृति से रूबर करवाने के लिए काफी होते है। पुरे प्रदेश में कि महिलाओ ने बड़ी धूमधाम से तीज मनाई। महिलाए सुबह घर का काम करने के बाद इकठे होकर नाचती गाती झूलने के लिए चल पड़ी और कई कई घंटो तक झूलती रही। झूलते समय जब पिंग को उपर चडाया जाता है तो महिलाए पेड़ों से पत्ते तोडकर लाती है और उसे सासु का नाक तोडना कहती है।
महिलाओं ने बताया कि गावों में उनके पूर्वज तीज का त्यौहार पिछले सेकड़ो वर्षों से मनाते आ रहे है और आज भी उसी पुरानी परम्परा के अनुसार तीज का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन बीते वक्त के साथ पेडो की संख्या घट गई है जिससे झूले डालने के लिए जगह / स्थान कम पड गया है। अगर इस तीज के त्योहार को हरियाली के रूप में हरियाणवी संस्कृति का अहम हिस्सा रखना है तो पैडों का बचाव करना भी जरूरी है। आज पेडो की कमी के कारण शहरों में पींग डालने के लिए जगह नहीं है लेकिन गांवो में यह परम्परा आज भी बरकरार है।