गुरुवार, 30 नवंबर 2017

तीन साल, मनोहर लाल, कभी बवाल तो,कभी सवाल ?

(सोनू शर्मा)  
कश्मीर की समस्या से निपटने का दावा करने वाली बीजेपी सरकार का दावा,उस समय फीका पड़ जाता है,जब कश्मीर से बुरा हाल कभी शांत रहे राज्य हरियाणा का हो जाता है।हरियाणा की सड़कों पर अगर आपको अर्धसैनिक बल नजर आए तो आपने मन में भी यही विचार आएगा कहीं कश्मीर में तो नहीं आ गए।चौकिए मत सही पढ़ा है आपने। पिछले तीन वर्षों में हरियाणा की कानून व्यवस्था खट्टर के हाथ में नहीं बल्कि तीन बार आर्मी और छह बार पैरा-मिलिट्री फोर्स के हाथों में रही है। भाजपा सरकार इन पर करीब 300 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुकी है।ऐसा नहीं है कि सरकार के लिए जाट आंदोलन ही गले की फांस बना हो,बल्कि साधू-संतो से निपटने के लिए भी सरकार को फोर्स की मदद लेनी पड़ी। तीन साल में विकास के तमाम दावे करने वाली खट्टर सरकार को इन तीन सालों में तीन बार प्रदेश के गृह सचिव और तीन ही बार पुलिस महानिदेशक को बदलना पड़ा।रामपाल की गिरफ्तारी के लिए सरकार को आर्मी बुलानी पड़ी। कई दिनों तक पैरा-मिलिट्री फोर्स डेरा डाले रही। 


इसके बाद फरवरी-2016 में जब जाटों ने आरक्षण के मुद्दे पर आंदोलन छेड़ा तो पैरा-मिलिट्री के अलावा आर्मी तक को बुला लिया गया, लेकिन न तो हिंसा रुकी और न ही आगजनी और लूटपाट। तीन दिन तो प्रदेश में ऐसे हालात थे, मानो सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं है। यह मामला तो अभी निपटा ही नहीं था कि चार महीने बाद जून-जुलाई में जाटों ने फिर आंदोलन छेड़ दिया। सरकार ने हरियाणा पुलिस पर भरोसा करने की बजाय पहले ही दिन पैरा-मिलिट्री फोर्स को बुला लिया। इसके बाद फरवरी-मार्च 2017 में फिर जाटों का आंदोलन शुरू हुआ। करीब महीना भर हाई-वोल्टेज ड्रामा चला। इस दौरान भी प्रदेश के करीब दो सप्ताह तक पैरा-मिलिट्री फोर्स की दर्जनों कंपनियों ने मोर्चा संभाले रखा।अब सरकार ने थोड़ी राहत लेने की सोची तो कभी सरकार के लिए मददगार साबित रहे बाबा राम रहीम सरकार के लिए मुसीबत बन कर खड़े हो गए।अगस्त 2017 में डेरामुखी से निपटने के लिए मनोहर सरकार को फिर से केंद्र की शरण में जाना पड़ा। पहले पैरा-मिलिट्री, फिर आर्मी बुलाई गई। पूरे मामले को लेकर सरकार को विपक्ष से लेकर आम जनता तक के गुस्से का शिकार होना पड़ा।इस पूरे प्रकरण में 38 लोगों की मौत हुई।फिलहाल बाबा राम रहीम रोहतक की सुनारिया जेल में 20 साल की सजा काट रहा है।



वहीं सरकार के लिए ताजा मुसीबत बनकर आई 26 नवंबर की रैलियां।दरअसल 26 नवंबर को हरियाणा में रैलियों का रविवार था।लेकिन ये कोई बड़ी बात नहीं थी रैलियां होती रहती है,लेकिन जींद में सांसद राजकुमार सैनी और जसिया में जाट संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक की रैलियों से निपटने के लिए भी सरकार को फिर से पैरा-मिलिट्री फोर्स की मदद लेनी पड़ी।इतना ही नहीं सरकार को रैलियों से निपटने के लिए इंटरनेट सेवा तक बंद करना पड़ी और कुछ रुटों पर रोडवेज की बसें भी बंद करनी पड़ी।साथ ही हरियाणा पुलिस के सभी कर्मचारियों की छुट्टियां भी रद्द करनी पड़ी। 


दिलचस्प बात ये है कि जाटों के कार्यक्रम में केंद्रीय इस्पात मंत्री बीरेंद्र सिंह और गैर जाट सम्मेलन में मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा पहुंचे। चौधरी छोटूराम के नाती बीरेंद्र सिंह हरियाणा भाजपा में बड़े जाट नेता हैं। वहीं, उपेंद्र कुशवाहा लोक समता पार्टी के ओबीसी नेता हैं। सैनी की रैली में बिहार के मुजफ्फरपुर से भाजपा सांसद अजय निषाद भी पहुंचे। हालांकि, दोनों रैलियों में हरियाणा सरकार भाजपा की ओर से कोई मंत्री-विधायक या नेता नहीं पहुंचा। माना जा रहा है कि भाजपा ने इनेलो और हुड्डा के जाट वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी कर ली है,जाट रैली में पूर्व मुख्यमंत्री और जाट चेहरा भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इस रैली को ये कहते हुए इंकार कर दिया था कि,वो 36 जात के नेता है,इसलिए जसिया रैली में नहीं आ सकते,लेकिन फतेहाबाद में होने वाली दलित चौपाल में हुड्डा का शामिल होना कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

                                                

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

21 साल, कब होंगे छात्र चुनाव बहाल ?

हरियाणा में छात्र राजनीति का लंबा इतिहास रहा है। राज्‍य के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से कई ऐसे छात्र नेता निकले, जिन्होंने अपनी धमक और कौशल के बूते हरियाणा और देश की राजनीति में सफल मुकाम हासिल किए। कोई विधायक बना तो किसी ने सांसद और मंत्री बनकर देश-प्रदेश की राजनीति में पूरा दखल बनाया। लेकिन, पिछले 21 साल से राजनी‍ति की प्राथमिक पाठशाला समझे जाने वाले छात्र संघ चुनाव बंद हैं। अब एक बार फिर राज्य में छात्र संघ के चुनाव कराने की मांग जोर पकड़ती जा रही है। ऐसे में सरकार दबाव में है और छात्र संगठन उत्साह में। दरअसल प्रदेश में पिछले  21  साल से छात्र संघ के चुनाव पर रोक लगी हुई है। इस पर रोक लगाए जाने के समय हरियाणा में हविपा-भाजपा गठबंधन की सरकार थी और मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल थे।



अब फिर छात्र संघ के चुनाव आरंभ करने की प्रक्रिया शुरू हुई है, लेकिन चुनाव कराने के प्रारूप पर सरकार और छात्र संगठन आमने सामने आ गए है। सरकार कालेजों में खून-खराबे की आशंका जताते हुए यह चुनाव आनलाइन चुनाव कराने के हक में है। दूसरी ओर, छात्र संगठन इस प्रक्रिया को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।दरअसल, हरियाणा में छात्र राजनीति के कई सुखद पहलू है तो दागदार पहलू भी कम नहीं है। प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कालेजों के कैंपस युवाओं के खून से रंगे हुए है। करीब एक दर्जन छात्र नेताओं की हत्या और हर जिले में मुकदमे बाजी से आजिज तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने 1996 में छात्र संघ के चुनाव पर रोक लगा दी थी। तब से छात्र राजनीति हाशिए पर है। इन 21 सालों में पिछले तीन साल को छोड़ कर राज्य में कांग्रेस और इनेलो की सरकारें रहीं। दोनों पार्टियों के छात्र संगठन लगातार अपनी सरकारों से छात्र संघ के चुनाव कराने की मांग करते रहे, लेकिन कोई पार्टी छात्र संघ के चुनाव बहाल करने का साहस नहीं जुटा पाई। लेकिन भाजपा ने 2014 में अपने चुनाव घोषणा पत्र में छात्र संघ के चुनाव बहाल करने का वादा किया था। अब 2017 है। तीन साल बाद मनोहर सरकार राज्य में छात्र संघ के चुनाव कराने को तो राजी हो गई, लेकिन चुनाव के प्रारूप पर पेंच फंस गया है। इस माह के अंत तक नए सिरे से बैठक कर सरकार और छात्र संगठन चुनाव के प्रारूप पर सहमति बनाने की कोशिश कर सकते है। हरियाणा में 1200 सरकारी,अर्ध सरकारी व निजी कॉलेज और लगभग 12 विश्वविद्यालय है। प्रदेश सरकार को यदि ऑनलाइन चुनाव के नतीजे अच्छे लगे तो इस प्रक्रिया को अगले शिक्षा सत्र से राज्य के सभी विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में लागू किया जा सकता है।

शिक्षा मंत्री प्रो. रामबिलास शर्मा ने चार सदस्यीय कमेटी से ऐसे कैंपस सुझाने को कहा है, जहां पायलट आधार पर चुनाव कराए जा सकते है। माना जा रहा कि पायलट आधार पर आनलाइन चुनाव कराने के लिए इसी माह फैसला ले लिया जाएगा और इस शिक्षा सत्र के अगले सेमेस्टर में ही यह प्रयोग कर लिया जाएगा। इनसो अध्यक्ष दिग्विजय सिंह चौटाला ने आनलाइन चुनाव प्रक्रिया का खुला विरोध किया है। उनका विरोध जारी रहा तो सरकार फिर से नई कार्ययोजना तैयार करने को अगले दस दिनों में बैठक बुला सकती है। चौटाला ने कहा कि आनलाइन चुनाव धोखा है और भाजपा द्वारा अपने चुनावी वादे से मुकरने का बहाना है।जबकि भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने चुप्पी साधते हुए सरकार के फैसले के प्रति समर्थन जाहिर किया है।