(सोनू शर्मा)
कश्मीर की समस्या से निपटने का दावा
करने वाली बीजेपी सरकार का दावा,उस समय फीका पड़ जाता है,जब कश्मीर से बुरा हाल कभी
शांत रहे राज्य हरियाणा का हो जाता है।हरियाणा की सड़कों पर अगर आपको अर्धसैनिक बल
नजर आए तो आपने मन में भी यही विचार आएगा कहीं कश्मीर में तो नहीं आ गए।चौकिए मत
सही पढ़ा है आपने। पिछले तीन वर्षों में हरियाणा की कानून व्यवस्था खट्टर के हाथ
में नहीं बल्कि तीन बार आर्मी और छह बार पैरा-मिलिट्री फोर्स के हाथों में रही है।
भाजपा सरकार इन पर करीब 300 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुकी है।ऐसा नहीं है कि सरकार के
लिए जाट आंदोलन ही गले की फांस बना हो,बल्कि साधू-संतो से निपटने के
लिए भी सरकार को फोर्स की मदद लेनी पड़ी। तीन
साल में विकास के तमाम दावे करने वाली खट्टर सरकार को इन तीन सालों में तीन बार
प्रदेश के गृह सचिव और तीन ही बार पुलिस महानिदेशक को बदलना पड़ा।रामपाल की
गिरफ्तारी के लिए सरकार को आर्मी बुलानी पड़ी। कई दिनों तक पैरा-मिलिट्री फोर्स
डेरा डाले रही।
इसके बाद फरवरी-2016
में जब जाटों ने आरक्षण के मुद्दे पर
आंदोलन छेड़ा तो पैरा-मिलिट्री के अलावा आर्मी तक को बुला लिया गया, लेकिन न तो हिंसा
रुकी और न ही आगजनी और लूटपाट। तीन दिन तो प्रदेश में ऐसे हालात थे, मानो सरकार नाम की
कोई चीज ही नहीं है। यह मामला तो अभी निपटा ही नहीं था कि चार महीने बाद जून-जुलाई
में जाटों ने फिर आंदोलन छेड़ दिया। सरकार ने हरियाणा पुलिस पर भरोसा करने की बजाय
पहले ही दिन पैरा-मिलिट्री फोर्स को बुला लिया। इसके बाद फरवरी-मार्च 2017 में फिर जाटों का
आंदोलन शुरू हुआ। करीब महीना भर हाई-वोल्टेज ड्रामा चला। इस दौरान भी प्रदेश के
करीब दो सप्ताह तक पैरा-मिलिट्री फोर्स की दर्जनों कंपनियों ने मोर्चा संभाले रखा।अब
सरकार ने थोड़ी राहत लेने की सोची तो कभी सरकार के लिए मददगार साबित रहे बाबा राम
रहीम सरकार के लिए मुसीबत बन कर खड़े हो गए।अगस्त 2017 में डेरामुखी से निपटने के
लिए मनोहर सरकार को फिर से केंद्र की शरण में जाना पड़ा। पहले पैरा-मिलिट्री, फिर आर्मी बुलाई गई।
पूरे मामले को लेकर सरकार को विपक्ष से लेकर आम जनता तक के गुस्से का शिकार होना
पड़ा।इस पूरे प्रकरण में 38 लोगों की मौत हुई।फिलहाल बाबा राम रहीम रोहतक की
सुनारिया जेल में 20 साल की सजा काट रहा है।
वहीं सरकार के लिए ताजा मुसीबत बनकर आई
26 नवंबर की रैलियां।दरअसल 26 नवंबर को हरियाणा में रैलियों का रविवार
था।लेकिन ये कोई बड़ी बात नहीं थी रैलियां होती रहती है,लेकिन जींद में सांसद
राजकुमार सैनी और जसिया में जाट संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक की रैलियों से
निपटने के लिए भी सरकार को फिर से पैरा-मिलिट्री फोर्स की मदद लेनी पड़ी।इतना ही
नहीं सरकार को रैलियों से निपटने के लिए इंटरनेट सेवा तक बंद करना पड़ी और कुछ
रुटों पर रोडवेज की बसें भी बंद करनी पड़ी।साथ ही हरियाणा पुलिस के सभी
कर्मचारियों की छुट्टियां भी रद्द करनी पड़ी।
दिलचस्प बात ये है कि जाटों के
कार्यक्रम में केंद्रीय इस्पात मंत्री बीरेंद्र सिंह और गैर जाट सम्मेलन में मानव
संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा पहुंचे। चौधरी छोटूराम के नाती बीरेंद्र सिंह
हरियाणा भाजपा में बड़े जाट नेता हैं। वहीं, उपेंद्र कुशवाहा लोक समता पार्टी के ओबीसी नेता हैं। सैनी की रैली
में बिहार के मुजफ्फरपुर से भाजपा सांसद अजय निषाद भी पहुंचे। हालांकि, दोनों रैलियों में हरियाणा सरकार भाजपा की ओर से कोई मंत्री-विधायक
या नेता नहीं पहुंचा। माना जा रहा है कि भाजपा ने इनेलो और हुड्डा के जाट वोट बैंक में सेंध लगाने की
तैयारी कर ली है,जाट रैली में पूर्व मुख्यमंत्री और जाट चेहरा भूपेंद्र सिंह हुड्डा
ने इस रैली को ये कहते हुए इंकार कर दिया था कि,वो 36 जात के नेता है,इसलिए जसिया रैली
में नहीं आ सकते,लेकिन फतेहाबाद में होने वाली दलित चौपाल में हुड्डा का शामिल
होना कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है।





