हरित प्रदेश को लहूलुहान होने से बचाइए
देश को आखिर वो दिन देखना पड़ा, जिसका डर था। नेतृत्वविहीन आंदोलन जातीय संघर्ष में तब्दील हो गया। आरक्षण की मांग पीछे छूट गई। प्रदेश अराजकता और अहंकार की आग में जल रहा है। रोहतक ने तीन लाल खो दिए। सरकार का धैर्य भी जवाब दे गया। शाम होते-होते आठ जिलों में सेना बुला ली गई। बेकाबू भीड़तंत्र यह नहीं समझ पा रहा कि सरकार से शुरू हुई उसकी लड़ाई प्रदेश के अपने ही भाईचारे के खिलाफ चली गई है। जितना आरक्षण से हासिल नहीं होना, उससे कहीं ज्यादा नुकसान हमने अपनी ही संपत्ति का कर लिया। भाईचारे को नफरत की भेंट चढ़ा दिया। आंदोलन की चिंगारी सुलगाने वालों ने प्रदेश को जलता छोड़कर चुप्पी ओढ़ ली है। कोई बचाने नहीं रहा। राजस्थान के गुर्जरों और गुजरात के पाटीदारों के आंदोलन का हश्र देखने के बावजूद उनकी चेतना नहीं जागी। इतिहास गवाह है कि जिन आंदोलनों में जनता की सहानुभूति नहीं होती या फिर जनता का नैतिक समर्थन नहीं होता, वे आंदोलन पिछड़ जाते हैं। यह बात शायद आंदोलन की आड़ में अराजक हुई भीड़ समझ नहीं पा रही है। यह केवल एक मांग है- जो शांतिपूर्ण तरीके से भी मनवाई जा सकती है। फिर विरोध का बीड़ा उठा भी लिया तो बातचीत के लिए नेतृत्व का होना बेहद जरूरी था। सरकार भी आखिर किससे बात करे। उपद्रवियों का तो कोई चेहरा होता ही नहीं। हालांकि सरकार समय रहते तो गैर जरूरी बयानबाजी रोक पाई और ही आंदोलन इतना उग्र हो जाएगा, इसका अंदाजा लगा पाई।
अब भी वक्त है। हमारे हरियाणा का सामाजिक आर्थिक ताना-बाना तहस-नहस हो, उससे पहले हमें इस आग को बुझाने के जतन करने होंगे। हरियाणा के हितों में अक्सर बड़ा फैसला सुनाने वाली और बड़े मुद्दों का समाधान करने वाली खापों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। वे तय करें कि आंदोलन मांग मनवाने के लिए हो रहा है या फिर प्रदेश के भाईचारे के खिलाफ। सवाल उन नेताओं पर भी उठेंगे, जो वोट बैंक की राजनीति के लिए चुपचाप प्रदेश का भाईचारा बिगड़ते देख रहे हैं। वे चाहते तो क्या मजाल कि प्रदेश यूं जंग का मैदान बन जाता। ऐसा भी नहीं है कि उनकी बात कोई नहीं सुनता। आंदोलन की आड़ में प्रदेश को जला रहे लोग यह क्यों भूल रहे हैं कि हाल ही में मौसम की मार झेल चुके किसानों के जख्म अभी भरे भी नहीं हैं कि हमने नए घाव दे दिए। प्रदेश के अधिकांश किसान कर्ज की मार झेल रहे हैं। ऐसे में यह अराजकता हरियाणा के आर्थिक ढांचे को जिस तरह से तहस-नहस कर रही है, उसका खामियाजा हमें ही भुगतना है। सियासतदानों को नहीं। जिस हरियाणा को प्रदेश के मेहनतकश किसानों ने कड़ी मेहनत से हरितक्रांति की कतार में खड़ा किया, उसे लहूलुहान होने से बचाइए। यह जिम्मा उन सभी का है, जो आंदोलन के समर्थन या विरोध में है। ये वक्त अभी सियासी बयान जारी करने का नहीं और ही इस हद तक हठ करने का कि आंदोलन हमारे अपनों की ही जान लेने पर अामादा हो जाए। यह वक्त अफवाहों को दरकिनार करने का है। हरियाणा को शांति की जरूरत है। हरियाणा बचेगा तभी किसी आरक्षण का कोई मतलब रहेगा। वरना ऐसे आंदोलन सिर्फ उपद्रव ही कहलाते हैं।
देश को आखिर वो दिन देखना पड़ा, जिसका डर था। नेतृत्वविहीन आंदोलन जातीय संघर्ष में तब्दील हो गया। आरक्षण की मांग पीछे छूट गई। प्रदेश अराजकता और अहंकार की आग में जल रहा है। रोहतक ने तीन लाल खो दिए। सरकार का धैर्य भी जवाब दे गया। शाम होते-होते आठ जिलों में सेना बुला ली गई। बेकाबू भीड़तंत्र यह नहीं समझ पा रहा कि सरकार से शुरू हुई उसकी लड़ाई प्रदेश के अपने ही भाईचारे के खिलाफ चली गई है। जितना आरक्षण से हासिल नहीं होना, उससे कहीं ज्यादा नुकसान हमने अपनी ही संपत्ति का कर लिया। भाईचारे को नफरत की भेंट चढ़ा दिया। आंदोलन की चिंगारी सुलगाने वालों ने प्रदेश को जलता छोड़कर चुप्पी ओढ़ ली है। कोई बचाने नहीं रहा। राजस्थान के गुर्जरों और गुजरात के पाटीदारों के आंदोलन का हश्र देखने के बावजूद उनकी चेतना नहीं जागी। इतिहास गवाह है कि जिन आंदोलनों में जनता की सहानुभूति नहीं होती या फिर जनता का नैतिक समर्थन नहीं होता, वे आंदोलन पिछड़ जाते हैं। यह बात शायद आंदोलन की आड़ में अराजक हुई भीड़ समझ नहीं पा रही है। यह केवल एक मांग है- जो शांतिपूर्ण तरीके से भी मनवाई जा सकती है। फिर विरोध का बीड़ा उठा भी लिया तो बातचीत के लिए नेतृत्व का होना बेहद जरूरी था। सरकार भी आखिर किससे बात करे। उपद्रवियों का तो कोई चेहरा होता ही नहीं। हालांकि सरकार समय रहते तो गैर जरूरी बयानबाजी रोक पाई और ही आंदोलन इतना उग्र हो जाएगा, इसका अंदाजा लगा पाई।
अब भी वक्त है। हमारे हरियाणा का सामाजिक आर्थिक ताना-बाना तहस-नहस हो, उससे पहले हमें इस आग को बुझाने के जतन करने होंगे। हरियाणा के हितों में अक्सर बड़ा फैसला सुनाने वाली और बड़े मुद्दों का समाधान करने वाली खापों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। वे तय करें कि आंदोलन मांग मनवाने के लिए हो रहा है या फिर प्रदेश के भाईचारे के खिलाफ। सवाल उन नेताओं पर भी उठेंगे, जो वोट बैंक की राजनीति के लिए चुपचाप प्रदेश का भाईचारा बिगड़ते देख रहे हैं। वे चाहते तो क्या मजाल कि प्रदेश यूं जंग का मैदान बन जाता। ऐसा भी नहीं है कि उनकी बात कोई नहीं सुनता। आंदोलन की आड़ में प्रदेश को जला रहे लोग यह क्यों भूल रहे हैं कि हाल ही में मौसम की मार झेल चुके किसानों के जख्म अभी भरे भी नहीं हैं कि हमने नए घाव दे दिए। प्रदेश के अधिकांश किसान कर्ज की मार झेल रहे हैं। ऐसे में यह अराजकता हरियाणा के आर्थिक ढांचे को जिस तरह से तहस-नहस कर रही है, उसका खामियाजा हमें ही भुगतना है। सियासतदानों को नहीं। जिस हरियाणा को प्रदेश के मेहनतकश किसानों ने कड़ी मेहनत से हरितक्रांति की कतार में खड़ा किया, उसे लहूलुहान होने से बचाइए। यह जिम्मा उन सभी का है, जो आंदोलन के समर्थन या विरोध में है। ये वक्त अभी सियासी बयान जारी करने का नहीं और ही इस हद तक हठ करने का कि आंदोलन हमारे अपनों की ही जान लेने पर अामादा हो जाए। यह वक्त अफवाहों को दरकिनार करने का है। हरियाणा को शांति की जरूरत है। हरियाणा बचेगा तभी किसी आरक्षण का कोई मतलब रहेगा। वरना ऐसे आंदोलन सिर्फ उपद्रव ही कहलाते हैं।